8 हफ्तों का थियेटर-टू-OTT नियम: जानिए कैसे इस एक फैसले ने बदल दी बॉलीवुड की बॉक्स ऑफिस रणनीति

 

क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो थियेटर में फिल्म का पोस्टर देखकर कहते थे—"छोड़ो यार, 4 हफ्ते बाद तो ओटीटी पर आ ही जाएगी"? बॉलीवुड के इसी 'ओटीटी कल्चर' पर ब्रेक लगाने के लिए जब मल्टीप्लेक्स मालिकों ने 8 हफ्तों की थियेटर-टू-ओटीटी विंडो का कड़ा नियम बनाया, तो शुरुआत में इसे एक बड़ा जोखिम माना गया था। लेकिन आज इसी एक फैसले ने बॉलीवुड के डूबते बॉक्स ऑफिस को न सिर्फ संभाला है, बल्कि कमाई के नए कीर्तिमान भी रच दिए हैं।

क्या है 8 हफ्तों का नियम और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?

कोरोना महामारी के दौर में हिंदी फिल्मों का थियेटर रिलीज के महज 3 से 4 हफ्तों के भीतर ओटीटी पर आ जाना एक आम बात बन गई थी। इसका सीधा नुकसान सिनेमाघर मालिकों को हुआ, क्योंकि दर्शकों ने थियेटर जाकर 300 रुपये की टिकट खरीदने के बजाय घर पर ही डिजिटल स्ट्रीम का इंतजार करना शुरू कर दिया था।

इस घाटे से निपटने के लिए पीवीआर-आईनॉक्स (PVR-INOX) और सिनेपॉलिस जैसे बड़े मल्टीप्लेक्स चेन्स ने सख्त फैसला लिया। उन्होंने साफ कर दिया कि जो हिंदी फिल्में थियेटर रिलीज के कम से कम 8 हफ्तों (56 दिनों) बाद ओटीटी पर स्ट्रीम होंगी, सिर्फ उन्हें ही मल्टीप्लेक्स में स्क्रीन्स दी जाएंगी।

बॉक्स ऑफिस पर कैसे दिखा इस फैसले का जादू?

इस नियम के लागू होते ही दर्शकों के व्यवहार में एक बड़ा बदलाव आया और पैदा हुआ 'FOMO' (फियर ऑफ मिसिंग आउट)। जब लोगों को समझ आया कि उन्हें ब्लॉकबस्टर फिल्मों के लिए दो महीने का लंबा इंतजार करना पड़ेगा, तो उन्होंने फिर से थियेटरों का रुख करना शुरू कर दिया।

  • बड़ी फिल्मों को मिला 'लॉन्ग रन': 'स्त्री 2', 'जवान' और 'पठान' जैसी बड़ी फिल्मों ने सिनेमाघरों में 50 दिनों से ज्यादा का शानदार सफर तय किया। पहले जो फिल्में 4 हफ्तों में सिमट जाती थीं, वे अब हफ्तों तक कमाई करती रही हैं।
  • छोटे और मध्यम बजट की फिल्मों की वापसी: '12th फेल' और 'आर्टिकल 370' जैसी कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों को थियेटरों में जमने का पूरा समय मिला। शुरुआत में धीमी गति से चलने के बावजूद, माउथ पब्लिसिटी के दम पर इन फिल्मों ने 50 करोड़ से ज्यादा का शानदार कारोबार किया।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का नया गेम प्लान

पहले नेटफ्लिक्स और अमेज़ॉन प्राइम वीडियो जैसी दिग्गज कंपनियां रिलीज के तुरंत बाद डिजिटल राइट्स हासिल करने के लिए भारी-भरकम रकम देती थीं। हालांकि, 8 हफ्तों का नियम लागू होने के बाद डिजिटल डील के स्ट्रक्चर में भी बड़ा बदलाव आया है।

अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स भी उन्हीं फिल्मों को प्राथमिकता दे रहे हैं जो थियेटर में लंबा टिकती हैं। उनका मानना है कि जो फिल्म थियेटर में सुपरहीट साबित होती है, उसकी ओटीटी पर भी व्यूअरशिप कई गुना बढ़ जाती है।

दर्शकों की सोच में आया बड़ा बदलाव

इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि दर्शकों में थियेटर जाकर फिल्म देखने का क्रेज वापस लौट आया है। अब सिनेमा केवल टाइम-पास नहीं, बल्कि एक 'सोशल एक्सपीरियंस' बन गया है जिसे लोग घर के सोफे पर बैठकर मिस नहीं करना चाहते।

सिनेमा को कभी ओटीटी से खतरा नहीं था, खतरा उस जल्दबाजी से था जिसने दर्शकों से थियेटर जाने की वजह छीन ली थी। 8 हफ्तों का यह नियम साबित करता है कि जब सिनेमा और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स अपनी-अपनी सीमाओं में रहकर काम करते हैं, तो जीत हमेशा मनोरंजन की ही होती है।

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